बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सर्पदंश मुआवजा योजना में बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया है कि सांप काटने से हुई मौत के नाम पर 431 फर्जी मामले तैयार कर करीब 17 करोड़ 24 लाख रुपए का मुआवजा हड़प लिया गया। मामले के उजागर होने के बाद अब तक 14 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं और कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।
विधानसभा में मामला उठने के बाद शुरू हुई जांच में डॉक्टरों, वकीलों, राजस्व कर्मचारियों और मृतकों के परिजनों की कथित मिलीभगत सामने आई है। पुलिस और प्रशासनिक जांच एजेंसियों को आशंका है कि जांच आगे बढ़ने पर और भी नाम सामने आ सकते हैं।
विधानसभा में उठा था मामला
बेलतरा विधायक Sushant Shukla ने 5 मार्च 2024 को विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से यह मामला उठाया था। इसके बाद हुए हंगामे के बीच राजस्व मंत्री Tank Ram Verma ने उच्च स्तरीय जांच का आश्वासन दिया था।
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जांच शुरू होने के बाद पिछले 24 दिनों में जिले के विभिन्न थानों में 14 एफआईआर दर्ज की गई हैं।
आंकड़ों ने खोली घोटाले की पोल
जशपुर जिले को छत्तीसगढ़ का नागलोक माना जाता है, जहां पिछले तीन वर्षों में केवल 96 सर्पदंश मौतें दर्ज की गईं। इसके विपरीत अकेले बिलासपुर जिले में 431 सर्पदंश मौतों के आधार पर 17 करोड़ 24 लाख रुपए का मुआवजा वितरित किया गया।
प्रारंभिक जांच में यही आंकड़ा अधिकारियों के संदेह का सबसे बड़ा आधार बना और इसके बाद पूरे मामले की पड़ताल शुरू हुई।
ऐसे तैयार किए जाते थे फर्जी दस्तावेज
सरकारी नियमों के अनुसार सर्पदंश से मृत्यु होने पर मृतक के परिजनों को 4 लाख रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। आरोप है कि इसी योजना का दुरुपयोग करते हुए सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत दर्शाया गया।
इसके लिए कथित रूप से फर्जी पंचनामा, झूठी गवाही और मेडिकल दस्तावेज तैयार किए गए। जांच अधिकारियों के अनुसार किसी भी सर्पदंश मृत्यु के मामले में पटवारी का पंचनामा, कोटवार की पुष्टि और सरकारी डॉक्टर की रिपोर्ट आवश्यक होती है। ऐसे में बिना विभागीय स्तर की मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा संभव नहीं माना जा रहा।
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जांच में सामने आए कई संदिग्ध मामले
जांच के दौरान कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें सामान्य मृत्यु को सर्पदंश बताकर मुआवजा लिया गया। आरोप है कि मृतकों के परिजनों और अन्य संबंधित लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर चार-चार लाख रुपए की सहायता राशि प्राप्त की।
अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में वास्तविक मृत्यु कारण को छिपाया गया और सरकारी रिकॉर्ड में सर्पदंश मृत्यु दर्शाकर भुगतान कराया गया।
डॉक्टर, वकील और कर्मचारी जांच के घेरे में
घोटाले की जांच में तहसील कार्यालय से जुड़े कर्मचारियों, वकीलों और बिचौलियों की भूमिका भी सामने आई है। पुलिस ने नगर निगम से तहसील कार्यालय में संबद्ध ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा, अधिवक्ता खांडेकर, बिल्हा के वकील रंजीत चतुर्वेदी समेत कई लोगों से पूछताछ की है।
बिल्हा क्षेत्र में एक महिला डॉक्टर और अन्य आरोपियों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है। पुलिस फिलहाल जांच प्रभावित न हो, इसलिए कुछ नामों का सार्वजनिक खुलासा नहीं कर रही है।
तहसील कार्यालय में बिचौलियों का नेटवर्क
जांच एजेंसियों को आशंका है कि तहसील कार्यालय में कर्मचारियों, ड्राइवरों, चपरासियों और कुछ वकीलों का एक नेटवर्क सक्रिय था, जो फर्जी दस्तावेज तैयार कर मुआवजा प्रकरणों को आगे बढ़ाने का काम करता था।
कुछ मामलों में यह भी सामने आया है कि परिजनों की पूरी जानकारी या सहमति के बिना मुआवजा राशि निकालकर उसका बंटवारा किया गया।
विभिन्न थानों में दर्ज हुए मामले
अब तक सरकंडा, सिविल लाइन, कोनी, कोतवाली, तोरवा और अन्य थाना क्षेत्रों में अलग-अलग मामले दर्ज किए जा चुके हैं। एक मामले में तहसीलदार द्वारा रतनपुर पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए पत्र भी भेजा गया है।
जांच एजेंसियों के अनुसार सामने आए मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और आने वाले दिनों में नई एफआईआर भी दर्ज हो सकती हैं।
विधायक ने की निष्पक्ष और व्यापक जांच की मांग
विधायक सुशांत शुक्ला ने कहा कि सरकार द्वारा जांच शुरू करना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन इतने बड़े घोटाले में केवल प्रारंभिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि 400 से अधिक मामलों में करोड़ों रुपए के मुआवजे का भुगतान हुआ है, इसलिए प्रत्येक मामले की गहन जांच होनी चाहिए।
उन्होंने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि पूरे नेटवर्क का खुलासा होना जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
