जाईं की हरियाली में अच्छी फसल की उम्मीद, करम देवता की पूजा में परिवार की खुशहाली की कामना; गीत-नृत्य के जरिए पीढ़ियों से सहेजी जा रही लोक विरासत
एमसीबी, 22 सितंबर 2026
रात गहराती है। गांव के आंगन में करम की हरी डाली सजी है। पास में मिट्टी का दीपक जल रहा है और मांदर की पहली थाप के साथ वातावरण में उत्सव की लय घुलने लगती है। महिलाएं गोल घेरे में कदम मिलाती हैं, पुरुष मांदर, झांझ और मोहरी की धुन साधते हैं। कहीं अच्छी फसल की कामना है तो कहीं परिवार की खुशहाली की प्रार्थना। बच्चों के लिए यह उत्सव कौतूहल और उमंग से भरा है, जबकि बुजुर्गों की स्मृतियों में पीढ़ियों पुरानी लोककथाएं और परंपराएं जीवित हैं। यही कर्मा पर्व है।

मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर और सरगुजा अंचल के जनजातीय जीवन में कर्मा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, परिवार और समुदाय के बीच गहरे रिश्ते को अभिव्यक्त करने वाला उत्सव है। करम की डाली, जाईं की हरियाली, बैगा की कथा और मांदर की थाप—इन सभी परंपराओं में लोकजीवन की अपनी अलग कहानी छिपी है।
कर्मा पर्व की सबसे खास पहचान करम वृक्ष की डाली है। पर्व के अवसर पर करम वृक्ष की डाली लाकर गांव के पटेल या प्रमुख व्यक्ति के आंगन में स्थापित की जाती है। इसे करम देवता का प्रतीक मानकर पूजा-अर्चना की जाती है। लोकमान्यता में करम की डाली प्रकृति, कृषि और समृद्धि से जुड़ी है। इसके सामने अच्छी फसल, अनुकूल वर्षा, परिवार की खुशहाली और गांव के कल्याण की कामना की जाती है। यह परंपरा प्रकृति और मानव जीवन के बीच जनजातीय समाज के गहरे संबंध को भी दर्शाती है।

कर्मा का उत्सव शुरू होने से पहले ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं। तीजा पर्व के अवसर पर महिलाएं टोकरी में जौ, गेहूं, मक्का, धान और अन्य फसलों के बीज बोती हैं। कुछ दिनों में ये बीज अंकुरित होकर हरी-हरी ‘जाईं’ का रूप लेते हैं। कर्मा पर्व तक इनकी हरियाली टोकरी को भर देती है। इन्हें सजाया जाता है, मिट्टी का दीपक जलाया जाता है और पूजा में अर्पित किया जाता है। एक छोटी-सी टोकरी में उगती यह हरियाली खेतों में लहलहाती फसल की उम्मीद का प्रतीक बन जाती है।
लोकमान्यता में ‘कर्मा’ को कर्म और ‘करम’ को शुभफल से जोड़कर भी देखा जाता है। इसका संदेश मेहनत और अच्छे कर्मों से जुड़ा है। करम देवता को कृषि, फसल, प्राकृतिक समृद्धि और सामुदायिक कल्याण से जोड़ा जाता है, इसलिए खेती-किसानी से जुड़े समाज में इस पर्व का विशेष महत्व है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाए जाने वाले इस पर्व में कई क्षेत्रों में बहनें भाइयों की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत भी रखती हैं। पूजा और प्रसाद के बाद व्रत खोलने की परंपरा है। इस तरह कर्मा कृषि और प्रकृति के साथ भाई-बहन के रिश्ते को भी जोड़ता है।

कर्मा पर्व की पूजा में गांव के बैगा की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। बैगा द्वारा करम राजा की कथा सुनाई जाती है और ग्रामीण श्रद्धा के साथ कथा का श्रवण करते हैं। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकस्मृतियों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने की प्रक्रिया भी है। बुजुर्गों के अनुभव, कहानियां और मान्यताएं मौखिक परंपरा के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं। यही लोक परंपरा जनजातीय संस्कृति को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पूजा समाप्त होने के बाद रात का उत्सव और गहराता जाता है। मांदर की थाप तेज होती है और करमा नृत्य शुरू होता है। महिलाएं हाथों में हाथ डालकर या श्रृंखला बनाकर गोल घेरे में नृत्य करती हैं, जबकि बीच में पुरुष गायक और वादक लोकगीतों की लय साधते हैं। मांदर, झांझ और मोहरी की धुन पूरे वातावरण को उत्सव में बदल देती है।

करमा नृत्य की खूबसूरती इस बात में है कि इसमें किसी एक व्यक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि पूरा समूह एक साथ कदम बढ़ाता है। गीतों में खेत, जंगल, रिश्ते, प्रेम, प्रकृति और जीवन के अनुभव दिखाई देते हैं। इसीलिए यह नृत्य मनोरंजन के साथ-साथ सामूहिकता और सामाजिक जुड़ाव की अभिव्यक्ति भी है।
कर्मा पर्व के दौरान परिवार, रिश्तेदार और समुदाय के लोग एक साथ आते हैं। युवा गीत और नृत्य के जरिए अपनी संस्कृति से जुड़ते हैं, बुजुर्ग परंपराओं की कहानियां सुनाते हैं और बच्चे अपनी सांस्कृतिक जड़ों को करीब से देखते हैं। इस सामूहिक सहभागिता के कारण कर्मा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहता, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का उत्सव बन जाता है।

मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर का वनांचल और यहां का विविध जनजातीय जीवन कर्मा पर्व को एक अलग सांस्कृतिक रंग देता है। भरतपुर के दूरस्थ इलाकों से लेकर खड़गवां के ग्रामीण अंचलों तक प्रकृति और लोकजीवन का रिश्ता दिखाई देता है। जंगल, खेत, नदी-नाले और स्थानीय संसाधनों से जुड़ी जीवनशैली यहां की लोकपरंपराओं में भी प्रतिबिंबित होती है। करम वृक्ष की पूजा प्रकृति के प्रति सम्मान, जाईं कृषि के महत्व और सामूहिक नृत्य सामाजिक एकता का संदेश देता है।
कर्मा पर्व छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में भी इसे स्थानीय परंपराओं के साथ मनाया जाता है। गोंड, संथाल, मुंडा और हो सहित विभिन्न समुदायों में पर्व मनाने की विधियों में भिन्नता दिखाई देती है। कहीं करम देवता की पूजा प्रमुख होती है, कहीं लोकगीत और नृत्य उत्सव का केंद्र बनते हैं। परंपराओं में विविधता के बावजूद प्रकृति के प्रति सम्मान, अच्छी फसल की कामना, परिवार की खुशहाली और सामुदायिक एकजुटता जैसी भावनाएं इसकी साझा पहचान हैं।

समय के साथ गांवों की जीवनशैली बदली है और मोबाइल-इंटरनेट ने मनोरंजन के तरीकों को भी बदल दिया है, लेकिन कर्मा पर्व की मूल परंपराएं अब भी कई गांवों में कायम हैं। करम की डाली उसी श्रद्धा से स्थापित होती है, जाईं उसी उम्मीद के साथ बोई जाती है, बैगा कथा सुनाते हैं और रात होते ही मांदर की थाप पर करमा नृत्य शुरू हो जाता है। नई पीढ़ी भी गीत, नृत्य और पारंपरिक आयोजनों के जरिए इस विरासत से जुड़ रही है।
आज जब पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि और सामाजिक एकता जैसे विषयों पर चर्चा हो रही है, तब कर्मा पर्व की परंपराएं अपने भीतर मौजूद संदेश के कारण और महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं। जंगल, मिट्टी, बीज, वर्षा और समुदाय के प्रति कृतज्ञता इस पर्व की मूल भावना में शामिल है। यह लोकपर्व याद दिलाता है कि जनजातीय जीवन में प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

कर्मा पर्व की असली खूबसूरती उसके अनुष्ठानों से आगे दिखाई देती है। करम की हरी डाली प्रकृति की याद दिलाती है, जाईं आने वाली फसल की उम्मीद जगाती है, बैगा की कथा अतीत को वर्तमान से जोड़ती है और मांदर की थाप पूरे समाज को एक घेरे में ला खड़ा करती है। यही वह प्रक्रिया है, जिसमें संस्कृति केवल संरक्षित नहीं रहती, बल्कि हर पीढ़ी के साथ दोबारा जीवित होती है।
जब तक गांव के आंगन में करम की डाली हरियाली का संदेश देती रहेगी, मांदर की थाप रात के सन्नाटे को तोड़ती रहेगी और नई पीढ़ी उस लय पर कदम मिलाती रहेगी, तब तक कर्मा पर्व जनजातीय समाज की जीवंत पहचान और लोकसंस्कृति की धड़कन बना रहेगा।
