रायपुर, 2 सितंबर 2026
छत्तीसगढ़ में बाल संरक्षण गृहों की पहचान अब सिर्फ औपचारिक नामों तक सीमित नहीं रहेगी। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने प्रदेश में संचालित बाल एवं बालिका संरक्षण गृहों और बाल संप्रेक्षण गृहों के नामों को अधिक सकारात्मक, संवेदनशील और बालहितैषी बनाने की पहल की है। आयोग ने ऐसे नाम रखने की अनुशंसा की है, जो बच्चों में सुरक्षा, आत्मसम्मान, अपनत्व और सकारात्मक सोच की भावना को मजबूत करें।
डॉ. वर्णिका शर्मा ने इस संबंध में महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र भेजकर आवश्यक कार्रवाई का आग्रह किया है। उनका कहना है कि किसी संस्था का नाम वहां रहने वाले बच्चों की मानसिकता और सामाजिक पहचान पर भी असर डाल सकता है। इसलिए नाम ऐसा होना चाहिए, जिससे बच्चों में हीनभावना के बजाय आत्मविश्वास और सम्मान की भावना पैदा हो।
आयोग ने जम्मू में बाल संरक्षण संस्थाओं के लिए प्रचलित ‘पलाश’ और ‘परिषा’ जैसे सकारात्मक एवं गरिमापूर्ण नामों का उदाहरण देते हुए छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह की पहचान अपनाने का सुझाव दिया है।
नई नामकरण प्रक्रिया में स्थानीय भाषा, संस्कृति, प्रकृति, लोक परंपरा और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े प्रेरणादायक नामों को प्राथमिकता देने की अनुशंसा की गई है। इससे संस्थाओं की पहचान स्थानीय परिवेश से जुड़ने के साथ बच्चों के लिए भी अधिक आत्मीय बन सकेगी।
आयोग ने यह भी सुझाव दिया है कि नाम तय करने से पहले संबंधित संस्थाओं में रहने वाले बच्चों, देखरेखकर्ताओं और अन्य हितधारकों से सुझाव लिए जाएं। इससे बच्चों को अपनी संस्था की नई पहचान तय करने की प्रक्रिया में शामिल किया जा सकेगा और उनके भीतर अपनत्व की भावना और मजबूत होगी।
महिला एवं बाल विकास विभाग से जिलों में प्रस्तावित नए नामों की सूची मंगाने और इस संबंध में की गई कार्रवाई की लिखित जानकारी आयोग को 21 सितंबर तक उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है।
