प्रो. ताराचंद बेलजी ने पंचमहाभूत आधारित कृषि, वृक्षायुर्वेद और प्रकृति-सम्मत खेती की उपयोगिता पर विद्यार्थियों से किया संवाद
रायपुर, 11 अगस्त 2026। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर में प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि तथा भारतीय पारंपरिक कृषि ज्ञान के विभिन्न आयामों पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में ताराचंद बेलजी तकनीक के संस्थापक प्रो. ताराचंद बेलजी ने विद्यार्थियों और शिक्षकों को प्राचीन भारतीय कृषि ज्ञान, वृक्षायुर्वेद और पंचमहाभूत आधारित प्राकृतिक कृषि पद्धतियों की जानकारी दी।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरिश चंदेल, निदेशक अनुसंधान सेवाएं डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी, अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय रायपुर डॉ. आरती गुहे सहित शिक्षक, वैज्ञानिक, अधिकारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे।
कृषि को केवल उत्पादन नहीं, समग्र व्यवस्था मानने पर जोर
कुलपति डॉ. गिरिश चंदेल ने विद्यार्थियों को भारतीय पारंपरिक कृषि ज्ञान प्रणालियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने और वर्तमान कृषि चुनौतियों के संदर्भ में उनकी उपयोगिता पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।
विशेष व्याख्यान में प्रो. बेलजी ने कहा कि भारतीय कृषि परंपरा में खेती को केवल उत्पादन की प्रक्रिया नहीं माना गया, बल्कि मृदा, जल, वायु, वनस्पति, जीव-जंतुओं और मानव के बीच संतुलन स्थापित करने वाली समग्र व्यवस्था के रूप में देखा गया है।
उन्होंने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यानी पंचमहाभूतों की कृषि व्यवस्था में भूमिका पर चर्चा करते हुए प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग पर जोर दिया।
मृदा स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर
प्रो. बेलजी ने मृदा को कृषि उत्पादन का आधार बताते हुए मृदा स्वास्थ्य, प्राकृतिक उर्वरता और जैविक गतिविधियों के संरक्षण को टिकाऊ कृषि के लिए महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने वर्तमान कृषि के सामने मौजूद मृदा स्वास्थ्य में गिरावट, जल संकट, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव और कृषि लागत में वृद्धि जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों के बीच प्रकृति आधारित कृषि पद्धतियों और भारतीय पारंपरिक ज्ञान का अध्ययन महत्वपूर्ण है।
वृक्षायुर्वेद की उपयोगिता भी समझाई
व्याख्यान में वृक्षायुर्वेद पर भी विस्तार से चर्चा हुई। प्रो. बेलजी ने पौधों और वृक्षों के स्वास्थ्य, पोषण, वृद्धि और संरक्षण से जुड़े पारंपरिक ज्ञान के विभिन्न पहलुओं की जानकारी विद्यार्थियों को दी।
उन्होंने स्थानीय संसाधनों और प्राकृतिक सामग्रियों के समुचित उपयोग के साथ पारंपरिक कृषि अनुभवों को समझने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित किया।
उनका कहना था कि आधुनिक कृषि विज्ञान और पारंपरिक भारतीय कृषि ज्ञान के बीच वैज्ञानिक समन्वय स्थापित कर अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल कृषि प्रणालियों के विकास की संभावनाएं तलाश की जा सकती हैं।
विद्यार्थियों ने पूछे सवाल
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य, पौध पोषण, पारंपरिक कृषि तकनीकों और टिकाऊ कृषि से जुड़े सवाल पूछे। प्रो. बेलजी ने विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए उन्हें कृषि के प्रति प्रकृति-सम्मत और समग्र दृष्टिकोण विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
यह व्याख्यान विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए भारतीय कृषि की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को समझने तथा वर्तमान कृषि चुनौतियों के संदर्भ में उसकी संभावित उपयोगिता पर विचार करने का महत्वपूर्ण अवसर रहा।
कार्यक्रम के अंत में कृषि महाविद्यालय, रायपुर की अधिष्ठाता डॉ. आरती गुहे ने आभार प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय एवं कृषि महाविद्यालय के शिक्षक, वैज्ञानिक, अधिकारी, कर्मचारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
