रायपुर। प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भू-स्वामी की मृत्यु के बाद उनके वारिसों के नाम जमीन हस्तांतरण यानी फौती नामांतरण (Mutation) की प्रक्रिया लंबे समय से जटिल और समय लेने वाली मानी जाती रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में जानकारी की कमी, लंबी कानूनी प्रक्रियाओं और बिचौलियों की सक्रियता के कारण ऐसे मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। इससे न केवल पारिवारिक विवाद बढ़ते हैं, बल्कि किसानों और ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
इसी चुनौती का समाधान प्रस्तुत करते हुए छत्तीसगढ़ के जनजातीय बहुल बस्तर जिले ने सुशासन का एक अनूठा मॉडल विकसित किया है। जिला प्रशासन ने पारंपरिक व्यवस्था से हटकर सक्रिय पहल करते हुए फौती नामांतरण के लंबित मामलों का बड़े पैमाने पर निराकरण कर प्रशासनिक दक्षता और डिजिटल गवर्नेंस की नई मिसाल पेश की है।
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आवेदन का इंतजार नहीं, जनता तक पहुंचा प्रशासन
सामान्यतः राजस्व विभाग में किसी मामले की प्रक्रिया तब शुरू होती है, जब संबंधित परिवार स्वयं आवेदन लेकर कार्यालय पहुंचता है। बस्तर प्रशासन ने इस व्यवस्था को बदलते हुए सक्रिय अभियान की शुरुआत की।
प्रशासन ने स्वयं गांव-गांव जाकर मृत भू-स्वामियों के रिकॉर्ड एकत्रित किए और लंबित फौती नामांतरण मामलों की पहचान कर उन्हें समयबद्ध तरीके से निपटाने का निर्णय लिया। 12 जून 2026 तक संकलित आंकड़ों के अनुसार जिले के 611 गांवों से डेटा जुटाकर फौती नामांतरण प्रकरणों का शत-प्रतिशत निराकरण सुनिश्चित करने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की गई है।
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ग्रासरूट प्रशासन की ‘त्रिमूर्ति’ बनी अभियान की ताकत
इस अभियान की सफलता के पीछे केवल डिजिटल तकनीक ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों का समन्वित प्रयास भी प्रमुख कारण रहा।
तहसीलदार और नायब तहसीलदार पूरे अभियान की निगरानी करते रहे तथा कानूनी प्रक्रियाओं को समय-सीमा के भीतर पूरा कर अंतिम आदेश जारी करते रहे। वहीं ग्राम सचिव, पटवारी और कोटवार की त्रिस्तरीय व्यवस्था ने अभियान को धरातल पर सफल बनाया।
अभियान के तहत ग्राम सचिवों ने जन्म एवं मृत्यु पंजीयक के रूप में पिछले चार वर्षों में मृत हुए 17,405 व्यक्तियों की विस्तृत सूची तैयार की।जिन मामलों में मृत्यु प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं थे, वहां परिवारों को प्रमाण पत्र उपलब्ध कराए गए। आवश्यकता पड़ने पर विलंब पंजीयन की अनुमति लेकर नए प्रमाण पत्र भी जारी करवाए गए, जिससे रिकॉर्ड अद्यतन करने की प्रक्रिया में तेजी आई।
‘भुइयां’ पोर्टल से हुई भूमि रिकॉर्ड की जांच
ग्राम सचिवों से प्राप्त सूची का मिलान पटवारियों ने राज्य के डिजिटल भूमि अभिलेख पोर्टल ‘भुइयां’ से किया। इस प्रक्रिया में 8,651 ऐसे मृत व्यक्तियों की पहचान हुई जिनके नाम पर भूमि दर्ज थी।
इसके बाद पटवारियों ने वारिसों से संपर्क कर आवेदन प्राप्त किए तथा उत्तराधिकार निर्धारित करने के लिए वंश वृक्ष तैयार किया। इससे नामांतरण प्रक्रिया को कानूनी रूप से मजबूत आधार मिला।अभियान की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोटवारों को सामाजिक सत्यापन की जिम्मेदारी सौंपी गई।
उन्होंने गांवों में जाकर मृतकों की सूची तथा तैयार किए गए वंश वृक्ष का भौतिक सत्यापन किया। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के कारण किसी प्रकार के फर्जी दावे या अनधिकृत नाम जोड़ने की संभावना लगभग समाप्त हो गई।
611 गांवों में चला विशेष अभियान
जिले की 10 तहसीलों के कुल 639 गांवों में से 611 गांवों को इस अभियान से जोड़ा गया। चिन्हित किए गए 8,651 मामलों में से 8,241 मामलों में ऑनलाइन नामांतरण पंजी (एमडी सीरीज) के माध्यम से विधिक प्रक्रिया पूरी कर आदेश जारी किए जा चुके हैं।
वर्तमान में पूरे जिले में केवल 410 प्रकरण ही लंबित बताए गए हैं, जिन पर कार्रवाई जारी है।
तोकापाल और बकावंड तहसील रहीं सबसे आगे
अभियान के दौरान विभिन्न तहसीलों का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा।तोकापाल तहसील में सर्वाधिक 1,553 मामले चिन्हित किए गए, जिनमें से 1,454 मामलों का सफल निराकरण किया गया। वहीं बकावंड तहसील ने 1,153 में से 1,142 मामलों का निपटारा कर लगभग शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर लिया है।
बस्तर तहसील में 1,087 में से 1,019, जबकि जगदलपुर तहसील में 1,061 में से 1,057 मामलों का निराकरण किया गया। भानपुरी तहसील ने भी 1,018 मामलों में से 959 मामलों का सफलतापूर्वक निपटारा किया।लोहंडीगुड़ा तहसील ने 805 में से 799 मामलों का निपटारा किया, जबकि करपावंड में 565 में से 504 और नानगुर में 544 में से 518 मामलों का समाधान किया गया।
दुर्गम क्षेत्र माने जाने वाले दरभा अंचल में 484 में से 452 मामलों का निराकरण हुआ। वहीं बास्तानार तहसील ने 381 में से 337 मामलों में भूमि रिकॉर्ड को अद्यतन किया।
किसानों और आदिवासियों को मिला सीधा लाभ
प्रशासन का कहना है कि इस अभियान के परिणाम केवल भूमि रिकॉर्ड सुधार तक सीमित नहीं हैं।
डिजिटल ट्रैकिंग और स्वतः संज्ञान प्रक्रिया के कारण बिचौलियों की भूमिका लगभग समाप्त हो गई है। समयबद्ध नामांतरण से किसानों और आदिवासियों को मानसिक तथा आर्थिक परेशानियों से राहत मिली है।
भूमि रिकॉर्ड अद्यतन होने के बाद नए भू-स्वामी अब किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), कृषि अनुदान, फसल ऋण और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से प्राप्त कर सकेंगे।
अगले चरण में 10 वर्षों के लंबित मामलों पर फोकस
जिला प्रशासन ने अभियान के पहले चरण में पिछले चार वर्षों के लंबित मामलों के निराकरण में सफलता हासिल की है। अब प्रशासन अगले चरण की तैयारी में जुट गया है।
नई योजना के तहत पिछले 10 वर्षों से लंबित फौती नामांतरण मामलों का शत-प्रतिशत निराकरण करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि बस्तर का यह मॉडल राज्य के अन्य ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है, जहां राजस्व सुधार और भूमि रिकॉर्ड अद्यतन करना आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
