रायपुर, 1 सितंबर 2026
‘रंग-तरंग’ में बिखरे छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत के सुर, लोकवाद्यों से आधुनिक संगीत तक दिखी संस्कृति की अनूठी झलक
रायपुर, 1 सितंबर 2026
छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और आधुनिक संगीत के विविध रंगों को एक मंच पर प्रस्तुत करने वाले तीन दिवसीय सांस्कृतिक आयोजन ‘रंग-तरंग’ का मंगलवार को महंत घासीदास संग्रहालय परिसर स्थित मुक्ताकाशी मंच पर भव्य शुभारंभ हुआ। आयोजन के पहले दिन लोकवाद्यों की गूंज, शास्त्रीय वाद्ययंत्रों की मधुर धुन और लोकगायन की सुमधुर प्रस्तुतियों ने माहौल को संगीतमय बना दिया। कलाकारों की प्रस्तुतियों के माध्यम से दर्शकों को छत्तीसगढ़ की लोककला, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के विविध रंग देखने और सुनने को मिले।

‘रंग-तरंग’ का आयोजन 1 से 3 सितंबर 2026 तक प्रतिदिन शाम 7 बजे से किया जा रहा है। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक एवं वाद्य संगीत परंपराओं को संरक्षित करना, उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना और स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए बेहतर मंच उपलब्ध कराना है। कार्यक्रम में पारंपरिक लोकधुनों को आधुनिक संगीत के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे संस्कृति और आधुनिकता का सुंदर संगम देखने को मिल रहा है।
पहले दिन सजी सुरों की मनमोहक महफिल
आयोजन के शुभारंभ अवसर पर विभिन्न विधाओं के कलाकारों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियां दीं। श्री विवेकानंद भारती एवं उनके साथियों ने लोक वादन फ्यूजन की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ के पारंपरिक वाद्य संगीत को आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत किया। मोहम्मद अयान रायकर ने पियानो वादन, अंबिकापुर के नासिर खान ने तबला वादन और रायपुर के श्री तारकेश्वर वर्मा ने बांसुरी वादन से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। वहीं रायपुर के लोकगायक राहुल ठाकुर ने लोकगायन की प्रस्तुति से छत्तीसगढ़ी लोकधुनों की मिठास और अपनी मिट्टी की खुशबू को मंच पर जीवंत कर दिया।

कार्यक्रम की सबसे खास बात पारंपरिक लोकवाद्यों और आधुनिक वाद्ययंत्रों के बीच देखने को मिला सुंदर तालमेल रहा। लोकधुनों के साथ पियानो, तबला और बांसुरी के सुरों ने प्रस्तुतियों को नया आयाम दिया। संगीत के इन प्रयोगों ने यह भी दिखाया कि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला आधुनिक मंच और नई पीढ़ी की पसंद के साथ कदमताल करते हुए अपनी पहचान को और व्यापक बना सकती है।
परंपरा को आधुनिकता से जोड़ना जरूरी : डॉ. संजय कन्नौजे
संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी समृद्ध लोकसंस्कृति, लोककला और संगीत परंपरा से है। प्रदेश के पारंपरिक वाद्ययंत्र केवल संगीत प्रस्तुत करने के साधन नहीं हैं, बल्कि वे यहां के लोकजीवन, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान की जीवंत अभिव्यक्ति हैं।
उन्होंने कहा कि ‘रंग-तरंग’ के माध्यम से पारंपरिक लोकवाद्यों और लोकधुनों को आधुनिक संगीत के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। इससे युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ ही पारंपरिक कलाकारों को नए दर्शकों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा। ऐसे आयोजनों से कलाकारों का आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें अपनी कला को बड़े मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।
डॉ. कन्नौजे ने कहा कि वर्तमान समय में परंपरा और आधुनिकता के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। जब पारंपरिक लोकधुनों और वाद्ययंत्रों को नए संगीत प्रयोगों के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो युवा वर्ग भी उनसे सहजता से जुड़ता है। ‘रंग-तरंग’ इसी सोच के साथ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक सार्थक पहल है।
कलाकारों को मिलेगा अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच
तीन दिवसीय आयोजन के दौरान अलग-अलग विधाओं के कलाकार अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की संगीत परंपरा की विविधता को सामने रखेंगे। इस आयोजन से लोक एवं वाद्य संगीत से जुड़े कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के साथ ही कला प्रेमियों और नई पीढ़ी तक अपनी कला पहुंचाने का अवसर मिल रहा है।
शुभारंभ अवसर पर संस्कृति उपसंचालक श्री उमेश मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार श्री दीपेंद्र दीवान, समाजसेवी श्री उदय भान सिंह चौहान, साहित्यकार श्रीमती शकुंतला तर्रार, साहित्यकार श्री अरविंद मिश्र सहित बड़ी संख्या में कला एवं संस्कृति प्रेमी और आम नागरिक उपस्थित रहे।
आयोजन के आगामी दो दिनों में भी विभिन्न लोकवाद्य, वाद्य संगीत और लोकगायन की प्रस्तुतियां होंगी। ‘रंग-तरंग’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकसंगीत परंपरा के साथ-साथ प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता और कलाकारों की प्रतिभा को व्यापक मंच मिलने की उम्मीद है।
