SHG से लिया ₹68 हजार का ऋण, अब हर महीने 8 से 9 लाख रुपए का बैंकिंग लेन-देन
रायपुर, 12 अगस्त 2026।
कभी बैंकिंग से जुड़े छोटे-छोटे कामों के लिए ग्रामीणों को गांव से बाहर जाना पड़ता था, लेकिन अब गांव में ही बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध हैं। इसकी वजह बनी हैं जशपुर जिले के कांसाबेल विकासखंड के टांगरगांव की संज्योति चौहान, जिन्होंने बिहान से जुड़कर न सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि अपने गांव के लोगों के लिए भी बैंकिंग की राह आसान कर दी।
संज्योति चौहान की कहानी बताती है कि स्व-सहायता समूह और सरकारी योजनाओं का सही इस्तेमाल महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत अवसर दे सकता है।
2019 से बैंक सखी के रूप में कर रहीं काम
ग्राम टांगरगांव की रहने वाली संज्योति चौहान चांदनी स्व-सहायता समूह से जुड़ी हैं। वर्ष 2019 से वे ग्रामीण बैंक से संबद्ध बैंक सखी के रूप में काम कर रही हैं।
बैंक सखी के तौर पर वे गांव में ही लोगों को बैंकिंग से जुड़ी विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं।
डिजिटल भुगतान से लेकर बैंकिंग लेन-देन और बीमा जैसी वित्तीय सेवाओं तक, संज्योति ग्रामीणों की मदद कर रही हैं।
₹68 हजार के ऋण से शुरू किया काम
संज्योति ने बैंक सखी के रूप में अपना काम शुरू करने के लिए स्व-सहायता समूह के माध्यम से 68 हजार रुपए का ऋण लिया था।
यही आर्थिक सहयोग उनके लिए आत्मनिर्भरता की शुरुआत बना।
आज वे न सिर्फ बैंकिंग सेवाएं दे रही हैं, बल्कि किराना दुकान का संचालन भी करती हैं।
यानी एक ओर ग्रामीणों को बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराने का काम और दूसरी ओर अपना व्यवसाय—संज्योति ने अपनी मेहनत से आय के दो रास्ते तैयार किए हैं।
हर महीने 8 से 9 लाख रुपए का लेन-देन
संज्योति के माध्यम से हर महीने लगभग 8 से 9 लाख रुपए का बैंकिंग लेन-देन होता है।
ग्रामीणों को अब बैंक से जुड़े कई छोटे-बड़े कामों के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
गांव में ही बैंकिंग सुविधा मिलने से लोगों का समय और आने-जाने का खर्च बच रहा है।
सिर्फ बैंकिंग नहीं, डिजिटल वित्तीय जागरूकता भी
संज्योति की भूमिका सिर्फ लेन-देन तक सीमित नहीं है।
वह ग्रामीणों को डिजिटल भुगतान और वित्तीय सेवाओं के प्रति जागरूक भी कर रही हैं।
ग्रामीणों को बैंकिंग प्रक्रियाओं की जानकारी देने के साथ वे बीमा जैसी सेवाओं से भी जोड़ रही हैं।
इससे गांव के लोगों के बीच डिजिटल और औपचारिक बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल बढ़ाने में मदद मिल रही है।
बिहान से मिला आगे बढ़ने का मौका
संज्योति चौहान का कहना है कि बिहान से जुड़ने के बाद उन्हें आगे बढ़ने के नए अवसर मिले।
स्व-सहायता समूह के माध्यम से मिला सहयोग और ऋण उनके लिए स्वरोजगार की शुरुआत का आधार बना।
आज वह अपने परिवार की आर्थिक जरूरतों में योगदान दे रही हैं और सम्मान के साथ आत्मनिर्भर जीवन जी रही हैं।
संज्योति की कहानी दूसरी महिलाओं के लिए भी मिसाल
संज्योति चौहान की सफलता सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है।
यह दिखाती है कि स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक सहयोग, ऋण और रोजगार के अवसर मिलें तो वे अपने परिवार के साथ-साथ पूरे गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भूमिका निभा सकती हैं।
बिहान से जुड़कर संज्योति ने पहले ऋण लिया, फिर बैंक सखी के रूप में काम शुरू किया और आज ग्रामीणों तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाने के साथ खुद भी आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं।
एक तरफ गांव की जरूरतें… दूसरी तरफ संज्योति का आत्मनिर्भर सफर।
₹68 हजार के ऋण से शुरू हुआ सफर आज हर महीने 8 से 9 लाख रुपए के बैंकिंग लेन-देन तक पहुंच चुका है।
संज्योति की कहानी यही संदेश देती है—
मौका मिले, सहयोग मिले और मेहनत हो… तो गांव की महिला भी अपने पैरों पर खड़ी होकर दूसरों के लिए रोजगार और सुविधा का माध्यम बन सकती है।
